जानिए कब श्री बलभद्र जी शेर के स्वरूप को धरण करने के लिए विवश हो गए थे ।

स्वर्णिम श्रंगार पहन मुस्कराए शेर स्वरूप शेषावतार !!
जतीपुरा आन्यौर में दाऊजी पूर्णिमा पर घर घर मना जन्म महोत्सव

ब्रजभूमि का ऐश्वर्य आज श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलभद्र के आंगन में सिमटा नजर आया। क्योंकि यह पूर्णिमा दाऊजी की पूर्णिमा के नाम से भी जानी जाती है। शेषावतार बलभद्र की दिव्यता का गुणगान पर्वतराज की शिला में समाहित है। गोवर्धन पर्वत के ऊपर बने मंदिर में बलभद्र गिरिराजजी की शिला में ही शेर के स्वरूप में विराजमान हैं। तलहटी की यह पावन स्थली भगवान की बाल लीलाओं का संग्रह बनी हुई है। श्रीराधा कृष्ण के महारास देखने की चाहत ने बलदाऊ को शेर का स्वरूप धारण करने को विवश कर दिया।

रविवार को दाऊजी की पूर्णिमा पर गोवर्धन पर्वत पर बने लुकलुक दाऊजी मंदिर में धूमधाम से महोत्सव मनाया गया। ब्रजवासी घर घर से विभिन्न व्यंजन तैयार करके लाए। रबड़ी और भांग बलदाऊ को अधिक प्रिय मानी जाती है। इस विशेष प्रसादी को लगभग सभी लोग लाकर समर्पित करते हैं। प्रभु के विशेष श्रृंगार ने भक्तों को अपलक निहारने पर मजबूर कर दिया। स्वर्ण आभूषण और जवाहरात से सजे बलदाऊ के सौंदर्य का गुणगान ब्रजभूमि का कण कण करता नजर आया।   

कुछ यूं सजा है धार्मिक इतिहास

परिक्रमा मार्ग के आन्योर- जतीपुरा के बीच गोवर्धन पर्वत पर गिरिराज जी की शिला में श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलभद्र जी शेर स्वरूप में विराजमान हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार चंद्र सरोवर में राधाकृष्ण और गोपियों के महारास की आभा में ब्रज मंडल डूबा हुआ था। महारास यानी जितनी गोपियां थी, उतने ही कृष्ण के स्वरूप थे। प्रत्येक गोपी कृष्ण के साथ भक्तिमय नृत्य करना चाहती थीं। मान्यता है कि आसमान में छह महीने तक चंद्रमा भी ठहर गए। महारास देखने का आकर्षण बलदाऊ को खींचने लगा। बलभद्र कान्हा से बड़े होने के कारण महारास में शामिल हो नहीं सकते थे। बलदाऊ गोवर्धन पर्वत के ऊपर खड़े हो गए और महारास का दर्शन करने लगे। इसी दौरान किसी गोपी की नजर पड़ी और उसने आवाज लगाई , देखो तो बलदाऊ खड़े हैं। गोपियां जैसे ही देखने लगी तो बलदाऊ शेर का स्वरूप धारण कर बैठ गए और सभी भ्रम समझ कर फिर रासलीला में लग गए। गिरिराज शिलाओं में बलभद्र का स्वरूप अब तक विराजमान हैं। सेवायत सुनील पुरोहित के अनुसार आज ही के दिन क्षीर सागर से बलभद्र जी की विशाल मूर्ति का प्राकट्य हुआ था, इसलिए इसे दाऊजी की पूर्णिमा कहा जाता है। ब्रजभूमि में यह उत्सव बड़े ही भावपूर्ण ढंग से मनाया जाता है।संवाद सूत्र, गोवर्धन(मथुरा):


https://www.jagran.com/uttar-pradesh/mathura-goverdhan-22309745.html

संपादक Manoj Kumar Shah

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