
सत्यनारायण पूजा का महत्व
बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा भोजपुरी समाज में विवाह के शुभ कार्यों के प्रारंभ से पूर्व भगवान सत्यनारायण की पूजा करने की परंपरा है। यह पूजा परिवार की सुख-शांति, समृद्धि तथा विवाह कार्य के निर्विघ्न सम्पन्न होने की कामना से की जाती है। मान्यता है कि भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की कृपा से सभी मांगलिक कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न होते हैं।
पूजा कब की जाती है?
सामान्यतः विवाह की तिथि निश्चित होने के बाद तथा विवाह की मुख्य रस्मों (मटकोड़, हल्दी, मंडप आदि) के प्रारंभ से पहले शुभ मुहूर्त में सत्यनारायण भगवान की पूजा की जाती है। कई परिवारों में यह पूजा वर एवं वधू दोनों पक्षों के घरों में अलग-अलग सम्पन्न होती है।
पूजा में कौन-कौन शामिल होते हैं?
इस पूजा में परिवार के सभी सदस्य, रिश्तेदार तथा शुभचिंतक सम्मिलित होते हैं। पंडित जी वैदिक विधि से पूजा सम्पन्न कराते हैं। परिवार के मुखिया तथा वर या वधू के माता-पिता मुख्य यजमान होते हैं।
पूजा सामग्री
सत्यनारायण पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है— पड़ित जी से लिस्ट ले लें
- भगवान सत्यनारायण का चित्र या प्रतिमा
- चौकी एवं स्वच्छ वस्त्र
- कलश
- आम के पत्ते
- नारियल
- पान एवं सुपारी
- रोली, हल्दी एवं अक्षत
- फूल एवं माला
- धूप, दीप एवं अगरबत्ती
- पंचामृत
- फल एवं मिठाई
- तुलसी दल
- गेहूँ या चावल
- प्रसाद हेतु शिरनी (पंजीरी, सूजी या आटे का प्रसाद)
पूजा विधि
पूजा स्थल को स्वच्छ कर चौकी पर भगवान सत्यनारायण की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। कलश स्थापना के बाद गणेश पूजन, नवग्रह पूजन एवं भगवान सत्यनारायण का पूजन किया जाता है। इसके पश्चात सत्यनारायण व्रत कथा का श्रवण किया जाता है। कथा के अंत में आरती, पुष्पांजलि तथा प्रसाद वितरण किया जाता है।
विवाह से संबंध
विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार है। इसलिए विवाह की तैयारियों के प्रारंभ में भगवान सत्यनारायण का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। मान्यता है कि इससे विवाह कार्य बिना किसी बाधा के सम्पन्न होता है तथा नवदंपति का जीवन सुख, शांति और समृद्धि से परिपूर्ण रहता है।
प्रसाद एवं सामूहिक भोजन
पूजा के उपरांत श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया जाता है। अनेक परिवारों में रिश्तेदारों एवं आमंत्रित अतिथियों के लिए सामूहिक भोजन या जलपान का आयोजन भी किया जाता है। इससे पारिवारिक एकता एवं आपसी सद्भाव को बढ़ावा मिलता है।
धार्मिक मान्यता
सत्यनारायण पूजा सत्य, धर्म, श्रद्धा एवं भगवान विष्णु की भक्ति का प्रतीक मानी जाती है। विवाह जैसे शुभ अवसर पर इस पूजा के माध्यम से परिवार भगवान से मंगलमय वैवाहिक जीवन, सुखी दांपत्य तथा उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करता है।
श्री सत्यनारायण भगवान की आरती
जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जन-पातक हरणा॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
रत्न जड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे।
नारद करत निरंतर, घंटा ध्वनि बाजे॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
प्रकट भए कलिकाल में, द्विज को दरस दियो।
बूढ़े ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी।
चन्द्रचूड़ एक राजा, तिनकी विपत्ति हरी॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीनी।
सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कर लीनी॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
भाव-भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धर्यो।
श्रद्धा धारण कीन्ही, तिनको काज सर्यो॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
ग्वाल-बाल संग राजा, वन में भक्ति करी।
मनवांछित फल दीन्हो, दीनदयाल हरी॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
श्री सत्यनारायण जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥
आरती के बाद जयकारा:
“श्री सत्यनारायण भगवान की जय!”
“लक्ष्मीपति भगवान विष्णु की जय!”
“सत्यनारायण स्वामी महाराज की जय!” 🙏
यह आरती बिहार, उत्तर प्रदेश और भोजपुरी समाज में सत्यनारायण कथा के समापन पर सर्वाधिक गाई जाती है।