
मटकोड़ (मटकोर) बिहार एवं भोजपुरी समाज के विवाह संस्कारों की एक महत्वपूर्ण रस्म है। विवाह से पूर्व शुभ मुहूर्त में पृथ्वी माता से विवाह कार्य हेतु पवित्र मिट्टी लेने की परंपरा को मटकोड़ कहा जाता है। यह रस्म मंगल गीत, पूजा-पाठ एवं पारिवारिक उत्सव के साथ सम्पन्न होती है।
मटकोड़ में कौन-कौन भाग लेते हैं?
मटकोड़ में परिवार की सुहागिन महिलाएँ, माता, चाची, भाभी, बुआ एवं अन्य महिला रिश्तेदार प्रमुख रूप से भाग लेती हैं। वर या वधू पक्ष के परिवारजन भी साथ रहते हैं। कई स्थानों पर पंडित द्वारा संक्षिप्त पूजा भी कराई जाती है।
मटकोड़ के लिए आवश्यक सामग्री
मटकोड़ में सामान्यतः निम्न सामग्री उपयोग की जाती है—
- ढोलक
- हल्दी
- पान का पत्ता
- सुपारी
- अक्षत (चावल)
- फूल
- पूजा की थाली
- दीपक एवं धूप
- मिट्टी खोदने हेतु खुरपी या कुदाली
- मिट्टी रखने की टोकरी या पात्र
- प्रसाद एवं मिठाई
ढोलक पूजा की परंपरा
मटकोड़ के लिए घर से निकलने से पहले ढोलक की विशेष पूजा की जाती है। ढोलक पर हल्दी लगाई जाती है तथा पान का पत्ता, सुपारी एवं अक्षत अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद मंगल गीतों की शुरुआत होती है। ढोलक को शुभ एवं मांगलिक कार्यों का प्रतीक माना जाता है, इसलिए उसकी पूजा के बाद ही जुलूस प्रस्थान करता है।
मटकोड़ की यात्रा
ढोलक, मंगल गीत तथा हल्के-फुल्के बाजे-गाजे के साथ सुहागिन महिलाएँ निर्धारित स्थान—जैसे तालाब, पोखर, नदी किनारे या अन्य शुभ स्थल—पर जाती हैं। रास्ते भर पारंपरिक विवाह गीत गाए जाते हैं जिससे वातावरण उत्सवमय बना रहता है।
मिट्टी कोड़ने की रस्म
निर्धारित स्थान पर पहुँचकर पृथ्वी माता का पूजन किया जाता है। इसके बाद शुभ मिट्टी को खुरपी या कुदाली से निकाला जाता है। मिट्टी पर हल्दी, अक्षत एवं पुष्प अर्पित कर उसे टोकरी या पात्र में रखा जाता है। यह मिट्टी विवाह मंडप एवं अन्य मांगलिक कार्यों के लिए घर लाई जाती है।
घर वापसी एवं स्वागत
मिट्टी लेकर लौटने पर परिवार के सदस्य महिलाओं का स्वागत करते हैं। मंगल गीत एवं हर्षोल्लास के बीच मिट्टी को सम्मानपूर्वक निर्धारित स्थान पर रखा जाता है। इसके बाद विवाह की अन्य रस्मों की तैयारी प्रारंभ होती है।
सामूहिक भोजन का आयोजन
मटकोड़ से लौटने के बाद कई परिवारों में सामूहिक भोजन अथवा जलपान का आयोजन किया जाता है। इसमें रिश्तेदार, पड़ोसी एवं सहभागी महिलाएँ सम्मिलित होती हैं। यह आयोजन पारिवारिक मेल-मिलाप, आनंद एवं उत्सव का प्रतीक माना जाता है।
धार्मिक एवं सामाजिक महत्व
मटकोड़ केवल मिट्टी लाने की रस्म नहीं, बल्कि पृथ्वी माता के प्रति श्रद्धा, परिवार की एकता, महिलाओं की सहभागिता तथा विवाह के शुभारंभ का प्रतीक है। मंगल गीत, ढोलक पूजा और सामूहिक भोजन इस संस्कार को सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाते हैं।
मटकोड़ गीत (पारंपरिक भोजपुरी सुर)
(मुखड़ा)
ए सखी चलS मटकोड़ करे,
धरती मइया के गोड़ धरे।
ए सखी चलS मटकोड़ करे,
मंगल गीत खुशी से गावे रे॥
(अंतरा 1)
ढोलक पर सिंदूर चढ़ावल,
हल्दी पान सुपारी धरल।
मंगल बेला शुभ घरी आई,
घर-आंगन में खुशी समाई॥
(अंतरा 2)
नदिया किनारे माटी कोड़ब,
गावत-गावत गीत जोड़ब।
सुहागिन सब मिलके जाई,
धरती मइया असीस दिलाई॥
(अंतरा 3)
माटी लेके घर जब आई,
मंगल धुन चहुँदिस छाई।
दुलहा-दुलहिन सुख पावें,
जीवन भर खुशहाल रहावें॥
(समापन)
मटकोड़ के रस्म निभाई,
सबके मन में खुशी समाई।
भोज-भात अब मिलके खाई,
धरती मइया के जस गाई॥
दूसरा लोकधुन वाला मटकोड़ गीत
मटकोड़ के दिनवा अइले हो राम,
गावS बहिनी मंगल गान।
ढोलक के पूजा भइल हो राम,
लागल सिंदूर के निशान।
पान-सुपारी चढ़वल गइल,
हल्दी के रंग सुहावन।
पोखरा पर माटी कोड़त,
गूंजे गीत मनभावन।
सोना जइसन माटी पावल,
भरल अंचरा सम्मान।
दुलहा-दुलहिन के सुख खातिर,
मांगे सब वरदान।
धरती मइया असीस दीहS,
भरS खुशियन के खान।
मटकोड़ के शुभ अवसर पर,
गूंजे मंगल गान॥
यह गीत धीमी झूमर या पारंपरिक भोजपुरी विवाह धुन में गाया जा सकता है, जैसा महिलाएँ हल्दी और मटकोड़ के समय सामूहिक रूप से गाती हैं।